Ep-18: आचार्य श्रीमद् प्रद्योतन सूरीश्वर जी
पट्टप्रद्योतक सूरि प्रद्योतन, महावीर पट्ट अढार । जिनप्रतिमा करी प्राणप्रतिष्ठित, नित् वंदन बारम्बार ॥ शासन नायक भगवान महावीर की देदीप्यमान पाट परम्परा के 18वें क्रम पर आचार्य विजय प्रद्योतन सूरि जी विराजे । आचार्य वृद्धदेव सूरि जी ने इनकी विद्वत्ता, दीर्घायु तथा शासन प्रभावना की सुयोग्यता, देखते हुए इन्हें आचार्य पदवी प्रदान की तथा अपने पाट पर विराजित किया।
आचार्य प्रद्योतन सूरि जी ने अजमेर में भगवान् ऋषभदेव स्वामी की भव्य प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा सम्पन्न कराई थी। इनकी प्रेरणा से धनपति दांशी नामक श्रावक ने सुवर्णगिरि (स्वर्णगिरि) पर यक्षवसही नामक देरासर का निर्माण कराया जिसमें आचार्य प्रद्योतन सूरि जी ने वि. सं. 210 में मूलनायक भगवान् महावीर स्वामी की जिनप्रतिमा प्रतिष्ठित की।
प्रद्योतन सूरि जी एक बार मारवाड़ क्षेत्र के नारदपुरी (नाडोल) नगर में पधारे। आचार्यश्री जी का प्रवचन सदा वैराग्यरस से ओतप्रोत होता था। एक बालक मानदेव भी उनका प्रवचन नियमित सुनता था । श्रेष्ठिपुत्र मानदेव पर उनके प्रवचनों का गहरा असर पड़ा। एक दिन व्याख्यान के बाद वह सहसा गुरुदेव को बोल पड़ा - “हे गुरुदेव! मैं माता - पिता से आज्ञा लेकर शीघ्र ही आपके पास दीक्षा लूंगा।” तेजस्वी बालक के मुख से ऐसे वचन सुन प्रद्योतन सूरि जी बोले - “जहा सुखम्” ह बालक मानदेव अनुक्रम से उनका शिष्य बन उनके पट्टधर आचार्य मानदेव सूरि के नाम से प्रख्यात हुआ ।
वे एक सद्गुरु की भांति रहे। उन्हें प्रतिपल - प्रतिक्षण चिंता होती कि कहीं उनका कोई शिष्य असंयम के दलदल में न फँस जाए। जब मुनि मानदेव की आचार्य पदवी हुई तब 2 देवियाँ नूतन आचार्यश्री के कंधे पर आ गई, जिससे सद्गुरु प्रद्योतन सूरि जी को चिंता हुई कि कहीं मानदेव इस ऋद्धि में आसक्त न हो जाए। लेकिन उनकी परवरिश बहुत मजबूत थी । मानदेव सूरि जी उनके सुयोग्य उत्तराधिकारी बने। जिनशासन की महती प्रभावना करते हुए वि. सं. 228 (वी.नि. 698) में प्रद्योतन सूरि जी देवलोक सिधार गए ।